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CG Kalchuri Vansh : छत्तीसगढ़ में कलचुरी वंश का इतिहास और महत्वपूर्ण प्रश्न

By: Shri Om Kumar

On: July 22, 2026

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CG Kalchuri Vansh : छत्तीसगढ़ के इतिहास में कलचुरी वंश (Kalachuri Dynasty) का स्थान सबसे महत्वपूर्ण और गौरवशाली माना जाता है। इस वंश ने छत्तीसगढ़ में सबसे लंबे समय तक (लगभग 800 से अधिक वर्षों तक) शासन किया। CGPSC, CG Vyapam और अन्य राज्य स्तरीय परीक्षाओं के दृष्टिकोण से यह टॉपिक बेहद महत्वपूर्ण है।

आइए, छत्तीसगढ़ में कलचुरी वंश के इतिहास, उनकी प्रशासनिक व्यवस्था, प्रमुख शासकों और परीक्षा में बार-बार पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्नों को विस्तार से समझते हैं।

कलचुरी वंश का परिचय और स्थापना

छत्तीसगढ़ में कलचुरी चेदि राजवंश (त्रिपुरी, मध्य प्रदेश) की एक शाखा थे। छत्तीसगढ़ में इनकी दो प्रमुख शाखाओं ने शासन किया:

  1. रतनपुर के कलचुरी (मुख्य शाखा)

  2. रायपुर के कलचुरी (लहुरी शाखा)

स्थापना का इतिहास:

  • प्रथम प्रयास: सर्वप्रथम 9वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में त्रिपुरी के राजा कोक्कल प्रथम के पुत्र शंकरगण द्वितीय (मुग्धतुंग) ने कौशल (छत्तीसगढ़) क्षेत्र पर आक्रमण कर बाण वंशीय शासकों को हराया और अपने भाई को यहाँ का राज्यपाल नियुक्त किया। लेकिन यह व्यवस्था स्थायी नहीं रही और सोमवंशियों ने इन्हें वापस खदेड़ दिया।

  • वास्तविक संस्थापक: लगभग 1000 ईस्वी में त्रिपुरी के शासक कोकल्ल द्वितीय के पुत्र कलिंगराज ने दक्षिण कौशल पर दोबारा विजय प्राप्त की और छत्तीसगढ़ में कलचुरी वंश की वास्तविक नीव रखी। उन्होंने तुमाण (वर्तमान कोरबा जिला) को अपनी पहली राजधानी बनाया।

कलचुरी कालीन प्रमुख शासक और उनका योगदान

कलचुरी काल के राजाओं ने छत्तीसगढ़ की संस्कृति, वास्तुकला और तालाबों के निर्माण में अभूतपूर्व योगदान दिया।

1. कलिंगराज (1000 – 1020 ई.)

  • छत्तीसगढ़ में कलचुरी राजवंश के वास्तविक संस्थापक।

  • राजधानी: तुमाण।

2. कमलराज (1020 – 1045 ई.)

  • इन्होंने त्रिपुरी के राजा गांगेयदेव के उत्कल (ओडिशा) अभियान में उनकी सहायता की थी।

3. रत्नदेव प्रथम (1045 – 1065 ई.)

  • राजधानी परिवर्तन: इन्होंने 1050 ई. में रतनपुर शहर की स्थापना की और अपनी राजधानी को तुमाण से रतनपुर स्थानांतरित किया।

  • रतनपुर को तालाबों का शहर और ‘कुबेर का नगर’ भी कहा जाता था।

  • इन्होंने रतनपुर में प्रसिद्ध महामाया मंदिर का निर्माण करवाया।

4. जाजल्लदेव प्रथम (1095 – 1120 ई.)

  • इस वंश के सबसे प्रतापी और शक्तिशाली राजा, जिन्होंने त्रिपुरी की अधीनता को पूरी तरह त्याग कर स्वयं को स्वतंत्र घोषित किया।

  • इन्होंने सोने और तांबे के सिक्के चलवाए, जिन पर ‘श्रीमद्जाजल्लदेव’ और ‘गजशार्दुल’ (हाथियों का शिकारी) अंकित था।

  • इन्होंने जांजगीर (जाजल्लपुर) शहर बसाया और वहाँ प्रसिद्ध विष्णु मंदिर (नकटा मंदिर) बनवाया।

  • बस्तर के छिन्दक नागवंशी राजा सोमेश्वर देव को पराजित कर सपरिवार बंदी बनाया (बाद में सोमेश्वर देव की माता गुंडमहादेवी के आग्रह पर मुक्त किया)।

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5. कल्याणसाय (1544 – 1581 ई.)

  • इन्होंने रतनपुर में ‘जमाबंदी प्रणाली’ (राजस्व व्यवस्था) लागू की, जिसके आधार पर छत्तीसगढ़ को शिवनाथ नदी के उत्तर और दक्षिण में 18-18 गढ़ों (कुल 36 गढ़) में विभाजित किया गया था। इसी प्रशासनिक इकाई के कारण इस क्षेत्र का नाम ‘छत्तीसगढ़’ पड़ा।

  • यह मुगल सम्राट अकबर के दरबार में भी गए थे (गोपल्ला गीत के अनुसार)।

6. रघुनाथ सिंह (अंतिम शासक – रतनपुर)

  • 1741 ईस्वी में मराठा सेनापति भास्कर पंत ने रतनपुर पर आक्रमण किया। उस समय वृद्ध राजा रघुनाथ सिंह बिना युद्ध किए आत्मसमर्पण कर बैठे, जिसके साथ ही छत्तीसगढ़ में स्वतंत्र कलचुरी शासन का अंत हो गया और मराठा शासन की नींव पड़ी।

रायपुर के कलचुरी (लहुरी शाखा)

14वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में कलचुरी वंश का विभाजन हुआ और एक शाखा रायपुर में स्थापित हुई, जिसे ‘लहुरी शाखा’ कहा जाता है।

  • संस्थापक: केशवदेव (14वीं सदी)।

  • रामचंद्र देव: इन्होंने अपने पुत्र ब्रह्मदेव के नाम पर रायपुर शहर की स्थापना की।

  • अंतिम शासक: अमरसिंह देव (1750 ई. में मराठों ने इन्हें बेदखल कर दिया)।

कलचुरी कालीन प्रशासनिक व्यवस्था

  • गढ़ व्यवस्था: पूरा साम्राज्य ‘गढ़ों’ में विभाजित था। प्रत्येक गढ़ के अंतर्गत 84 ग्राम आते थे जिसे ‘चौरसी’ कहा जाता था। चौरसी के नीचे 12 ग्रामों की इकाई होती थी जिसे ‘बारहों’ कहते थे।

  • प्रमुख प्रशासनिक पद:

    • महाप्रमातृ: राजस्व और भूमि मापन का सर्वोच्च अधिकारी।

    • महाक्षपटलिक: लेखा विभाग (Accounts) का प्रमुख।

    • महासांधिविग्रहिक: विदेश और युद्ध-संधि का मंत्री।

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सरकारी परीक्षाओं में कलचुरी वंश से अक्सर नीचे दिए गए प्रश्न पूछे जाते हैं:

प्रश्न 1. छत्तीसगढ़ में कलचुरी वंश का वास्तविक संस्थापक किसे माना जाता है?

  • उत्तर: कलिंगराज (1000 ई.)।

प्रश्न 2. कलचुरियों की छत्तीसगढ़ में प्रथम राजधानी कौन सी थी?

  • उत्तर: तुमाण (वर्तमान कोरबा जिला)।

प्रश्न 3. रतनपुर के प्रसिद्ध महामाया मंदिर का निर्माण किस कलचुरी शासक ने करवाया था?

  • उत्तर: रत्नदेव प्रथम ने (1050 ईस्वी के आसपास)।

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प्रश्न 4. किस कलचुरी राजा के सिक्कों पर ‘गजशार्दुल’ अंकित था?

  • उत्तर: जाजल्लदेव प्रथम।

प्रश्न 5. छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध ‘जमाबंदी प्रणाली’ या गढ़ व्यवस्था की शुरुआत किस राजा ने की थी?

  • उत्तर: राजा कल्याणसाय ने।

प्रश्न 6. रायपुर शहर की स्थापना किस कलचुरी राजा द्वारा की गई थी?

  • उत्तर: राजा रामचंद्र देव ने (अपने पुत्र ब्रह्मदेव राय के नाम पर)।

प्रश्न 7. वर्ष 1741 में किस मराठा सेनापति ने कलचुरी राज्य रतनपुर पर आक्रमण किया था?

  • उत्तर: भास्कर पंत (नागपुर के भोंसला शासक रघुजी प्रथम के सेनापति)।

प्रश्न 8. रतनपुर के अंतिम स्वतंत्र कलचुरी शासक कौन थे?

  • उत्तर: राजा रघुनाथ सिंह।

प्रश्न 9. कलचुरी प्रशासन में लगान या राजस्व विभाग के सर्वोच्च अधिकारी को क्या कहा जाता था?

  • उत्तर: महाप्रमातृ।

प्रश्न 10. ‘गोपल्ला गीत’ छत्तीसगढ़ के इतिहास के किस वंश से संबंधित है?

  • उत्तर: कलचुरी वंश (इसमें राजा कल्याणसाय के दिल्ली या मुगल दरबार में रहने का वर्णन मिलता है)।

याद रखने योग्य शार्ट ट्रिक (Timeline Sequence)

कलचुरी राजवंश की राजधानियों के क्रमिक बदलाव को आप इस तरह याद रख सकते हैं:

1.तुमाण:प्रथम राजधानी.

कलिंगराज द्वारा स्थापित छत्तीसगढ़ में कलचुरियों का पहला प्रशासनिक केंद्र।

2.रतनपुर:द्वितीय राजधानी.

रत्नदेव प्रथम द्वारा 1050 ई. में स्थापित। यह इस वंश की सबसे दीर्घकालिक और मुख्य राजधानी रही।

3.खल्लारी / रायपुर:लहुरी शाखा की राजधानी.

शाखा विभाजन के बाद पहले राजधानी खल्लारी (महासमुंद) बनी, जिसे बाद में रामचंद्र देव और ब्रह्मदेव राय के काल में रायपुर स्थानांतरित किया गया।

कलचुरी कालीन प्रमुख मंदिरों और स्थापत्य कला की विस्तृत सूची

छत्तीसगढ़ में कलचुरी काल (1000 ई. से 1741 ई.) को न केवल राजनीतिक स्थिरता बल्कि स्थापत्य कला (Architecture) और मूर्ति कला का ‘स्वर्ण काल’ भी कहा जाता है। इस काल के शासक परम शैव (भगवान शिव के उपासक) और शाक्त (देवी दुर्गा के उपासक) थे, जिसके कारण उन्होंने राज्य में भव्य मंदिरों और तालाबों का निर्माण करवाया।

नीचे कलचुरी कालीन प्रमुख मंदिरों, उनके निर्माणकर्ताओं और विशेषताओं की विस्तृत सूची दी गई है:

कलचुरी कालीन प्रमुख मंदिर और उनके निर्माणकर्ता
क्र.मंदिर का नामस्थान निर्माणकर्ताप्रमुख विशेषता 
1महामाया मंदिररतनपुर (बिलासपुर)रत्नदेव प्रथमनागर शैली में निर्मित। यह छत्तीसगढ़ के सबसे प्रसिद्ध शक्तिपीठों में से एक है।
2विष्णु मंदिर (नकटा मंदिर)जांजगीरजाजल्लदेव प्रथमयह मंदिर आज भी अधूरा है। गर्भगृह के शीर्ष पर भगवान विष्णु की प्रतिमा और चारों ओर सुंदर नक्काशी है।
3पृथ्वीदेवेश्वर शिव मंदिरतुमाण (कोरबा)पृथ्वीदेव प्रथमतुमाण कलचुरियों की पहली राजधानी थी। यहाँ वर्तमान में मंदिर के केवल भव्य अवशेष और स्तंभ शेष हैं।
4शिव मंदिर (अष्टकोणीय)पाली (कोरबा)राजा विक्रमादित्य मूल मंदिर बाणवंशी राजा ने बनवाया था, परंतु कलचुरी शासक जाजल्लदेव प्रथम ने इसका भव्य जीर्णोद्धार (Renovation) करवाया। इसके गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर गंगा-यमुना की मूर्तियां हैं।
5लखनेश्वर महादेव मंदिरखरौद (जांजगीर-चांपा)रत्नदेव तृतीय के प्रधानमंत्री गंगाधरखरौद को ‘छत्तीसगढ़ की काशी’ कहा जाता है। इस मंदिर के शिवलिंग में एक लाख छिद्र हैं, जिसके कारण इसे लखनेश्वर कहा जाता है।
6खल्लारी माता मंदिरखल्लारी (महासमुंद)देवपाल (मोची)लहुरी (रायपुर) शाखा के राजा हरिब्रह्मदेव के शासनकाल में एक मोची (देवपाल) द्वारा इस मंदिर का निर्माण कराया गया था।
7हटकेश्वर महादेव मंदिररायपुर (खारून नदी तट)हाजीराज (ब्रह्मदेव राय के काल में)रायपुर के कलचुरी राजा ब्रह्मदेव राय के शासनकाल में उनके मंत्री/सेवक हाजीराज द्वारा निर्मित। यह नागर शैली का सुंदर उदाहरण है।
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कलचुरी कालीन स्थापत्य कला की प्रमुख विशेषताएं

कलचुरी काल के मंदिरों और कलाकृतियों में कुछ खास बातें देखने को मिलती हैं, जो परीक्षाओं में अक्सर कूट (Statement) वाले प्रश्नों के रूप में पूछी जाती हैं:

  • नागर शैली का प्रभाव: छत्तीसगढ़ के अधिकांश कलचुरी मंदिर नागर शैली (North Indian Style) में बने हैं, जिनमें गर्भगृह, अंतराल और मंडप स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं।
  • द्वार पर गंगा-यमुना का अंकन: मंदिरों के गर्भगृह (Sanctum Sanctorum) के मुख्य प्रवेश द्वार पर देवी गंगा (मकरवाहिनी) और देवी यमुना (कूर्मवाहिनी) की सुंदर मूर्तियां उकेरी गई हैं।
  • द्वारपाल के रूप में शैव प्रतीक: चूंकि अधिकांश राजा शैव मत को मानने वाले थे, इसलिए मंदिरों के द्वारों पर जय-विजय के स्थान पर शिव के गणों या शैव प्रतीकों का अंकन अधिक मिलता है।
  • लाल बलुआ पत्थर (Red Sandstone) का उपयोग: स्थापत्य कला में स्थानीय स्तर पर मिलने वाले लाल और भूरे बलुआ पत्थरों का बहुतायत से प्रयोग किया गया है।

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